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Friday, 17 November 2017

डी पी एस बल्लबगढ़ शिक्षा शेत्र में लगातार अग्रसर : आरती अनिल लॉंवंड प्रधानाचार्य

डी पी एस बल्लबगढ़ शिक्षा शेत्र में लगातार अग्रसर : आरती अनिल लॉंवंड प्रधानाचार्य

फरीदाबाद, 18 नवम्बर।डी पी एस बल्लबगढ़ ने अपना पहला सत्र वर्ष २०१४ में शुरू किया था l क्योंकि यह शुरुआत ही थी इसलिए हमें विद्यार्थियों  और स्टाफ को “डी पी एस “ के उन मापदंडों के अनुसार ढालना था जिसके लिए “डी पी एस “ विख्यात है l 

विद्यालय के पहले ही वर्ष में यहाँ के विद्यार्थियों ने इंटर-डी पी एस प्रतियोगिताओं में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राजकीय स्तर की प्रतियोगिताएं में अनेक पुरस्कार जीतकर विद्यालय के इतिहास में स्वर्णिम पन्ने जोड़ने में सफलता प्राप्त की l 

विद्यालय को बहुत ही सक्षम और मज़बूत मैनेजमेंट का सहयोग होने से विद्यालय को निरंतर नई ऊँचाइयाँ छूने में सहायता मिली l श्री एस पी लाल , प्रो वाईस चेयरमैन, जो कि एक जाने माने दूरदर्शी और एक अनुभवी शिक्षाविद हैं, ने विद्यालय को अपने विज़न द्वारा  प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है l 

“पीस एजुकेशन” द्वारा हमारा एक सतत प्रयास है कि हम अपने विद्यार्थियों को “एजुकेशन फॉर लाइफ “ प्रदान कर पायें क्योंकि यही समय की मांग है l इसके लिए हम विद्यार्थियों को “ब्रेन स्टोर्मिंग” सेशंस के द्वारा यह प्रयास करते हैं कि विद्यार्थियों की ऊर्जा उनके उन्नत और स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त करे l    इसके अलावा हम विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने की दिशा में उन्हें एक आदर्श व्यक्तित्व बनाने की ओर प्रेरित करने के लिए उन्हें वार्तालाप , चाल ढाल, मुस्कुराना, पढाई करना, आपस में मिल बाँट कर रहना, अपने अलावा औरों के सुख दुःख के बारे में सोचना , दान, उदार विचारधारा आदि के गुणों को समाहित करते हुए एक आदर्श व्यक्ति बनने की दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं l

डी पी एस यह भी प्रयास करता है कि विद्यार्थियों में एक आदर्श मानव के गुण समाहित हों जिनमें प्रमुख हैं सत्य , अहिंसा, प्रेम, ईमानदारी , कर्तव्यपरायण और समय की प्रतिबद्धताl हमारा प्रयास है कि हमारे विद्यार्थी उल्लसित जीवन व्यतीत करें, उनकी स्वस्थ जीवन शैली हो और उनमें रचनात्मक प्रतियोगी भावना का संचार हो l हमारा मानना है कि इन गुणों के समाहित होने से हमारे विद्यार्थी एक शांति और भाई चारे के माहौल में आगे बढ़ेंगे और उनके अन्दर से हिंसा की प्रवृत्ति को समाप्त करने में सफलता मिलेगी l 

एक सशक्त मार्गदर्शन द्वारा हमारे लिए यह संभव हो पा रहा है कि हम इन सभी गुणों को सही तरीके से अवलोकन कर पायें और विभिन्न माध्यमों द्वारा अपने विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज तक अपना सन्देश समुचित प्रकार से पहुंचाने में सक्षम हैं l 

हम भाग्यशाली हैं कि हमारी टीम में  अनुभवी और प्रगतिशील सोच वाले अध्यापक शामिल हैं जो अपने अपने विषय से सम्बंधित आवश्यक ज्ञान से समर्थ हैं जिससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, निडरता और निश्चय करने की क्षमता के साथ जीवन को एक सौहार्द के नज़रिए से समझने की योग्यता पैदा की जा सके l 

हमारे विद्यार्थी अच्छे फुटबॉल खिलाडी, रैपर, नर्तक, परिपक्व वक्ता, अपनी बुद्धिमता का प्रमाण देते हुए रोबोटिक्स में कार्य करने वाले, अबेकस, वैदिक गणित, ओलिम्पियाड में सक्षम, शांति रैली में स्वयंसेवक की भूमिका में और अन्य सामाजिक कार्यों में आगे बढ़कर अपने हुनर का प्रदर्शन करते हुए ग्लोबल एजुकेशन के मापदंडों पर भी खरे साबित होते हैं l 

हमारे विद्यार्थियों को हम अपनी शुभकामनायें प्रेषित करते हैं :
• प्रतिदिन सीखने का प्रयास करें और कभी भी “सीख” को ना टालें 
• सुखद क्षणों का सम्पूर्ण आनंद लें 
• स्वयंम में बहु-आयामी, टास्किंग और स्थायित्व के प्रति विवधता जागृत करें  
• अपने व्यव्हार को स्वाभाविक बनाये 
• अपने विकास के लिए महत्वाकांक्षी बनें 
• अपने विकास के लिए स्वयं ही सीमायें निश्चित ना करें क्योंकि आपका व्यक्तित्व असीमित है 
• अपनी कुशलताओं और सकारात्मक सोच के द्वारा आप निश्चित रूप से  इस संसार में अपार सफलता को पाने में सक्षम होंगे

Thursday, 16 November 2017

संभव है मिर्गी का इलाज: डॉ. कदम नागपाल

संभव है मिर्गी का इलाज: डॉ. कदम नागपाल

 फरीदाबाद 16 नवम्बर । एशियन अस्पताल के न्यूरो फिजिशियन डॉ. कदम नागपाल ने बताया कि मिर्गी शरीर का एक ऐसा विकार है जो मस्तिष्क में असामान्य तरंगे पैदा करता है। इन तरंगों के कारण झटके आते हैं और दौरे पड़ते हैं। कई ऐसी दवाएं है मौजूद हैं, जिसके जरिए 75 प्रतिशत मिर्गी को कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ मामले ऐसे होते हैं जिन्हें रिफ्लेक्ट्री एपिलेप्सी का नाम दिया जा है इसे एपिलेप्सी सर्जरी से कंट्रोल किया जा सकता है। डॉ. कदम का कहना है कि सबसे पहले लोगों को मिर्गी के बारे में जागरुक रहना चाहिए। किसी भी व्यक्ति में मिर्गी के लक्षण नज़र आने पर तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। डॉक्टर के निर्देशानुसार दवाओं का सेवन करते रहना चाहिए और नियमित रूप से जांच कराते रहना चाहिए। खासकर ऐसी महिलाएं जो गर्भधारण करने योज्य हैं या फिर गर्भवती हैं और वे मिर्गी की शिकार हैं उन्हें निरंतर डॉक्टर से जांच कराते रहना चाहिए ताकि उनकी और उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को किसी भी प्रकार की गंभीर समस्या होने से बचाया जा सका। 

लक्षण: कमजोरी, शरीर का अनियंत्रित होना, चेहरे मांस-पेशियों में खिंचाव होना, शरीर में जकडऩ, आंखों का चढऩा, बेहोशी या झटके आना मिर्गी के लक्षण हैं। इसमें मरीज का शरीर पर संतुलन नहीं रहता,मुंह से झाग निकलते हैं। 

कारण: नींद की कमी, तनाव, सिर पर चोट लगना, समय पर दवाओं का सेवन न करना, कुछ दवाओं के इस्तेमाल का दुष्परिणाम,दूर्घटना, तेज बुखार होने, खून में ग्लूकोज की मात्रा का कम होने के कारण मिर्गी के दौरे पड़ सकते हैं।

बचाव के उपाय: भरपूर नींद लें। 
धूम्रपान के सेवन से बचें।
व्यायाम व सैर करें।
नियमित दवा लें। डॉक्टर के सलाह के बिना कोई दवा न लें।
लंबी दूरी की यात्रा में खुद गाड़ी न चलाएं।
तैराकी न करें।
मिर्गी का दौरा आने पर क्या करें: सबसे पहले पीडि़त के कपड़े ढ़ीले कर दें, ताकि उसे हवा लगे।
दौरे के दौरान पीडि़त को कुछ भी खिलाना या पिलाना नहीं चाहिए।
व्यक्ति के पास से नुकीली वस्तुएं हटा दें।
व्यक्ति को आरामदायक जगह पर एक करवट पर लिटा दें।
मुंह से कुछ भी खिलाने की कोशिश न करें और न ही कुछ पीने को दें। ऐसे करने पर खाना या पानी सीधा जाने पर मरीज की मौत हो सकती है।
जल्द से जल्द सभी सुविधाओं से लैस नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाना चाहिए।

Sunday, 29 October 2017

भक्ति में विश्वास का स्थान - कृपा सागर

भक्ति में विश्वास का स्थान - कृपा सागर

फरीदाबाद:29अक्टूबर (National24news) विश्वास एक ऐसा शब्द है जिससे साधारण से साधारण व्यक्ति भी परिचित है। धनवान् हो या निर्धन, शिक्षित हो या अशिक्षित, शहरी हो या ग्रामीण सभी जानते हंै कि विश्वास संसार के हर रिश्ते का एक अनिवार्य अंग ही नहीं उसकी सफलता का प्रमुख द्वार है। हमारे सम्बन्ध घर-परिवार के सदस्यों के साथ हों, अपने कार्यालय या कम्पनी में अपने ऊपर या नीचे के स्तर के सहयोगियों से हों, मित्रों या ग्राहकों से हों तभी सुखद और स्थाई हो सकते हैं यदि उन्हें हमारे प्रति और हमें उनके प्रति विश्वास बना रहे, कायम रहे।

ईश्वर के साथ हमारा भक्ति का नाता है। प्रेम के साथ-साथ यहाँ भी विश्वास भक्ति का एक अनिवार्य अंग है, इसकी सफलता की कंुजी है। जहाँ प्रेम शरीरों का मोहताज है, विश्वास के लिए इष्टदेव भगवंत के गुण, उसकी शक्तियां आधार बनती हैं। इसीलिए आध्यात्मिक जगत् में प्रायः विश्वास की बजाय ‘श्रद्धा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। भक्ति में जब हम निराकार प्रभु परमात्मा से प्रेम करना चाहते हंै तो साकार सत्गुरु, ब्रह्मज्ञानी संतों अथवा इसके बन्दों को माध्यम बना लेते हैं परन्तु श्रद्धा सीधे ही निरंकार में व्यक्त करते हैं। श्रद्धा में एक अवस्था ऐसी भी आ जाती है जब भक्त और भगवन्त एक हो जाते हैं और भक्त निराकार से वह नोंक-झोंक कर जाते हैं जो साधारणतः प्रेम-संबंध में होती है, जैसे-

जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता, 
पतित् पावन नाम तेरो कैसे हुंता!
अर्थात् यदि हम पाप नहीं करते तो तुम पतित-पावन कैसे कहलाते, यानि यदि आप हमारे लिए विशेषता रखते हैं तो आपके लिये हमारा अस्तित्व भी कम महत्वपूर्ण नहीं।

इसी प्रकार -
जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बंधन तुम बांधे,
अपने छूटन कउ जतन करौ हम छूटे तुम आराधे।
अर्थात् हे ईश्वर! यदि तुमने हमें मोह माया के बंधनों में जकड़ रखा है तो हमने भी तुम्हें अपने प्रेम के बंधन में जकड़ लिया है। हम तो तुम्हारी आराधना करके छूट जायेंगे मगर तुम हमारे प्रेम के बन्धन से कैसे छूट पाओगे? 

भक्ति में विश्वास अथवा श्रद्धा का अर्थ है पूर्ण समर्पण। हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना तो करते हैं मगर यह अधिकार ईश्वर को ही देते हैं कि यह हमें क्या, कितना और कब देता है, देता भी है कि नहीं देता है। हमें विश्वास रहता है कि इसका निर्णय ही हमारे हित में है। हम तो अपने हितों के बारे में अंजान हो सकते हैं मगर ईश्वर सब जानता है। यहाँ राजा जनक अपने राज-पाट का अभिमान नहीं करते और न ही कबीर जी सांसारिक पदार्थों की कमी के लिए शिकवा-शिकायत करते हैं, मगर दोनों ही एक जैसी आनन्द की स्थिति में हैं क्योंकि दोनों को ही ईश्वर ने जो कुछ प्रदान किया है उससे संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं। दोनों ही ब्रह्यज्ञानी हैं, ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखते हुए समर्पित भाव से विचरण करते हैं।

विश्वास हमें असत्य से निकालकर सत्य की ओर अग्रसर करता है। अनेकता की भटकन से निकालकर एक में स्थित करता है। विश्वास पूर्ण पर ही टिकेगा किसी अधूरेपन की गुंजाइश ही नहीं। यह विश्वास ही है जो हमें अपनी मंजिल परम् सत्य ईश्वर तक पहुँचाता है। हमने पूर्ण सत्गुरु पर विश्वास किया तो उसी ने हमें यह मंजिल दी जिसके बाद हमें न किसी अन्य मार्गदर्शक की आवश्यकता महसूस होती है न किसी अन्य भगवंत की।

विश्वास हमारा भाग्य बदल देता है जीवन में क्रांति लाने का कारण बन जाता है। कहा जाता है कि एक अंधा व्यक्ति हज़रत ईसा मसीह जी के पास आया और कहने लगा - ’’प्रभु मेरी आँखों पर हाथ फेर दो मुझे विश्वास है कि मुझे मेरी नज़र मिल जायेगी।’’ उन्होंने लाख मना किया कि यह शक्ति मेरे पास नहीं है परन्तु नेत्रहीन व्यक्ति यही कहता रहा कि मुझे विश्वास है कि आपके हाथ फेरने से मुझे मेरी नज़र मिल जायेगी। अंत में हज़रत ईसा मसीह जी मान गए और जैसे ही उन्होंने उसकी आंखों पर हाथ फेरा उसको दिखाई देने लग गया। कह उठा कि श्देखा प्रभु, मुझे विश्वास था कि आपके हाथों में यह शक्ति है।श् आगे से प्रभु बोले - श्यह मेरी शक्ति का नहीं तुम्हारे विश्वास का चमत्कार है।श् इस तरह विश्वास हमारा भाग्य बदल देता है।

ईश्वर पर विश्वास आने से हमारा मन शुद्ध हो जाता है। हमारे अंदर से तमाम विपरीत भावनायें दूर हो जाती हंै और प्यार, प्रीत, नम्रता, सहनशीलता जैसे मानवीय गुणों को स्थान देती हैं, हमारे जीवन को सुंदर बना देती हैं। ईश्वर पर विश्वास इसकी रज़ा में रहने का, अपने अंदर सब्र संतोष की भावना को प्रबल करने का साधन बन जाता है।

विश्वास हमारे व्यक्तिगत अनुभव का परिणाम होता है। किसी के कहे सुने पर विश्वास करना तो अंध विश्वास ही कहलाता है जो व्यक्ति को लाभ कम हानि अधिक देता है। हमारा ज्ञान, भक्ति सब व्यक्तिगत होते हैं। सेवा, सत्संग, सुमिरण हमारा अपना-अपना होता है।

विश्वास हमें दूसरों के निकट होने का साधन बनता है। संतों भक्तों का मानना है कि हम सभी पर विश्वास करें और इस बात के लिए भी तैयार रहें कि हो सकता है उनमें से कोई छल करने वाला भी निकल आए। परन्तु यह नीति उस नीति से कहीं बेहतर है जिसमें हम किसी पर भी विश्वास न करें और किसी से भी धोखा न खायें।

 संत निरंकारी मिशन में हमें प्रेरणा दी जाती है कि हम संतों का संग करें ताकि हमारा ईश्वर प्रभु परमात्मा पर विश्वास बना रहे और इसके दिव्य गुणों का लाभ हम अपने सामाजिक अथवा सांसारिक जीवन में भी प्राप्त कर सकें।


Saturday, 28 October 2017

मैट्रो अस्पताल में लवकाग्रस्त मरीजों के लिए कारगार साबित हो रही है थ्रोम्बोलाइसिस इजेक्शन तकनीक- डा. रोहित गुप्ता

मैट्रो अस्पताल में लवकाग्रस्त मरीजों के लिए कारगार साबित हो रही है थ्रोम्बोलाइसिस इजेक्शन तकनीक- डा. रोहित गुप्ता

फरीदाबाद:28अक्टूबर (National24news)  मैट्रो अस्पताल में 300 से अधिक मरीजों को किया गया पूरी तरह ठीक आज वल्र्ड स्ट्रोक डे के अवसर पर मैट्रो अस्पताल के न्यूरोलोजी विभाग के सीनियर कंसलटेंट न्यूरोलोजिस्ट डा. रोहित गुप्ता ने कहा कि स्ट्रोक मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा आम कारण है। यह भारत में वयस्क विकलांगता का प्रमुख कारण है। पिछले कुछ दशकों में विकसित देशों के मुकाबले जहाँ स्ट्रोक का प्रसार घटा गया है, भारत में स्ट्रोक का बोझा बढ़ते ही जा रहा है।

भारत में स्ट्रोक के प्रसार के बढ़ने के कुछ कारण है जैसे धूम्रपान, बढ़ती लम्बी उम्र और शहरीकारण द्वारा लाइफस्टाईल में बदलाव। लोगों में स्ट्रोक के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए मैट्रो अस्पताल में डा. रोहित द्वारा फेसबुक का लाइव सेशन भी किया, जिसमें कई मरीजों में अपने प्रश्न पूछे। डब्ल्यूएचओ ने पाया कि भारत में स्ट्रोक के बोझ का हाइपरटेन्शन, धूम्रपान, बढ़ता लिपिड स्तर और डाएबीटिज कुछ महत्वपूर्ण कारण है। तीव्र स्ट्रोक/लकवाग्रस्त रोगियों के लिए थ्रोम्बोलाइसिस इंजेक्शन एक नई तकनीक है। मैट्रो अस्पताल नियमित रूप से मस्तिष्क में धमनियों की रूकावट के उपचार के लिए थ्रोम्बोलाइसिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।

 मैट्रो अस्पताल, फरीदाबाद में थ्रोम्बोलाइसिस तकनीक द्वारा अब तक 300 से अधिक मरीजों को ठीक किया जा चुका है। इसके लिए उम्र की कोई समय-सीमा नहीं हैं। हमारे विभाग में उच्च न्यूरो इमेजिंग तकनीकी संसाधन है। अस्पताल में एम.आर.आई. व सीटी स्कैन की सुविधा भी उपलब्ध है। तीव्र स्ट्रोक/लकवाग्रस्त 40 साल से कम के लोगों में भी हो सकता है। भारत में तीव्र स्ट्रोक/लकवे से 10 से 15 प्रतिशत मरीज 40 से कम उम्र के होते है। थ्रोम्बोलाइसिस तकनीक 18 साल से ऊपर के किसी भी मरीज पर की जा सकती है। युवा मरीजों पर इसके रिजल्ट बहुत अच्छे होते है। डा. एस.एस. बंसल मैनेजिंग डायरेक्टर मैट्रो अस्पताल, फरीदाबाद ने हमें बताया कि थ्रोम्बोलाइसिस की यह तकनीक लकवा होने के 4ण्5 घंटे तक की जा सकती है। तीव्र स्ट्रोक/लकवाग्रस्त होने पर मरीज को जल्द से जल्द अस्पताल पहुँच जाना चाहिये। क्योंकि जल्दी से उपचार मिलने पर इसके अच्छे परिणामों की प्राप्ति 100 प्रतिशत तक हो सकती है। 

डा. रोहित गुप्ता ने कहा कि थ्रोम्बोलाइसिस चिकित्सा के उपयोग व जागरूकता पर जोर देने की जरूरत है। विंडो पीरियड का महत्व, थ्रोम्बोलाइसिस चिकित्सा का लाभ, स्ट्रोक के बारे में जानकारी होनी चाहिये। इस अवसर पर मैट्रो अस्पताल के डायरेक्टर एवं वरिष्ठ हृदय रोग विषेषज्ञ डा. एस.एस. बंसल का कहना है कि मैट्रो अस्पताल नई-नई तकनीक के माध्यम से लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए प्रयासरत है और आने वाले समय में भी अस्पताल नई-नई तकनीकों के माध्यम से लोगों को बहेतर चिकित्सा सेवाएं देने के लिए कार्य करता रहेगा। साथ ही उन्होंने कहा की जागरूकता, समय रहते बिमारियों से बचाव एवं अनुशासिक जीवन प्रणाली एक बेहद कारगर उपाय है, इन सभी गंभीर बिमारियों से बचने के संदर्भ में मैट्रो अस्पताल, फरीदाबाद जानकारी के विभिन्न उपायों को करते रहते है।

Friday, 27 October 2017

सुविधा विद्या का पर्याय नहीं :ऋषिपाल चौहान

सुविधा विद्या का पर्याय नहीं :ऋषिपाल चौहान

फरीदाबाद 27अक्टूबर (National24news) भारत अपनी स यता, शिक्षा एवं संस्कृति के लिए वि यात है। हमारी प्राचीनतम शिक्षण प्रणाली दुनिया के लिए सदैव कौतुहल का विषय रही है। विश्व की अनेक स यताएँ पठन-पाठन के लिए भारत के बताए मार्ग पर चलती हैं नालंदा और तक्षशिला अपनी शिक्षा पद्घति के लिए ही वि यात थे परन्तु आज छवि बदल चुकी है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की स्थिति बदहाल है। सोचने का विषय है कि यह स्थिति क्यों और कैसे बनी है? आज सभी अभिभावक यही सोचते हैं कि वे विद्यालय में अपने बच्चें के लिए शिक्षा अर्जन नहीं बल्कि सुविधाओं के उपयोग के लिए भेज रहे हैं। विद्यालय अब ज्ञान अर्जन की जगह न हो कर सुविधाओं की खरीद फरो त का विषय बन चुका है। समाज में सभी को यह सोचना होगा कि शिक्षा अर्जन के लिए साधना करनी पड़ती है। केवल सुविधाओं के नाम पर व्यवसाय करना या करना गलत है, 

इसी से शिक्षा का मूल उद्ïदेश्य समाप्त हो जाता है। भारत देश में शिक्षा का उद्ïदेश्य बहुत महान हुआ करता था जहाँ शिक्षक की तुलना भगवान से की जाती थी परन्तु नवीन संस्कृति में यह पर परा अब लुप्त हो रही है। अभिभावक अपने बच्चे के लिए शिक्षा की गुणवत्ता को नहीं देखता बल्कि वह वहाँ उपलब्ध सुविधाओं को ही देखता है। सुविधाओं के मामले देखा जाए तो तकनीकी सुविधाएँ होना तो आवश्यक है क्योंकि इससे शिक्षा सरल एवं सहज हो जाती है और भविष्य के लिए तकनीकी ज्ञान आवश्यक होता है क्योंकि इसी के माध्यम से छात्र अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। ज्ञान देना व अर्जन करना दोनों ही उद्ïदेश्य महान हैं परन्तु दुर्भाङ्गय का विषय है कि आज आधुनिकिकरण में यह भी एक फैशन बन चुका है। अभिभावक अपने बच्चे को सुविधाओं से सुसज्जित स्कूल में भेजना ही अपना कत्र्तव्य मानते हैं और यहीं शुरू होती है होड़ जो एक खतरनाक मोड़ की ओर ले जाते हैं। अब समय आ चुका है कि सरकार भी इस विषय पर सोचे और विद्या अर्जन के इस महान उद्ïदेश्य को भ्रमित होने से रोकें।


Tuesday, 3 October 2017

आ.....अब हम लौट चलें....खुशी की ओर....: कुलदीप सिंह

आ.....अब हम लौट चलें....खुशी की ओर....: कुलदीप सिंह

फरीदाबाद:3 अक्टूबर (National24news) आज शहरों में लोगों की जीवन शैली दिन पर दिन अति आधुनिक होती जा रही है और अपने को आधुनिक का प्रतीक दिखाने के चक्कर में अपनी खुशियों के पैमाने और अर्थ दोनों ही बदलते जा रहे हैं। आजकल लोगों की नये तरीके की जीवन शैली विकास की कमशकश और भागमभाग से त्रास्त दिख रही है। केवल ऊपरी मुस्कान का दिखावा बढ़ रहा है - अंतर की वास्तविक खुशी तो गायब हो रही है। आधुनिक हो रहे जीवन में यदि आराम बढ़ता है तो कोई विवाद नहीं हो सकता, पर आज की आधुनिकता की कीमत परिवार के तनावमुक्त स्वस्थ वातावरण की बलि देकर नहीं चुकाई जा सकती। शायद हमारे बच्चे पहले ही ऐसे वातावरण से वंचित होते जा रहे हैं और हमारे वो संबंध जो हमें आपस में बांधे रखते थे, बड़ी तेजी से समाप्ति की ओर जा रहे हैं।

आज हमें अपने निजी व्यवहार और जीवन शैली में आ गये बदलाव पर अत्यधिक विचार करने की तीव्र आवश्यकता है और इस काम में हमारी परम्पराओं की संस्कृति हमारी सहायता अच्छी तरह कर सकती है। अपने परिवारों के बीच प्रेम और सम्मान का वातावरण तथा परस्पर सद्भावना के निर्माण के लिए ऐसे ही कछ विचारों पर हम ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं जो हमारी मदद हमेशा करते हैं।

1. सेवा: यह एक ऐसा संबोधन है जिसमे ंअपने कर्तव्य बोध के साथ समर्पण भी जुड़ा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा अनुभव यही रहा है कि घर की नौकरानी द्वारा दी गई एक कप चाय.....और घर के परिवार के सदस्य पत्नी, पुत्राी और या पुत्रावधू द्वारा प्रस्तुत एक कप चाय...........मिठास का अंतर तो अनुभव हो ही जाता है। पहले वाली चाय में शायद केवल कर्तव्य बोध है जबकि दूसरी में कर्तव्य के साथ अनुराग भी बांध लेता है। यही भावना ही धीरे-धीरे आगे चलकर प्रेम और सम्मान में बदल जाती है।

2. परिवार कक्ष: हमारे घर में एक तो जगह ऐसी जरूर हो, जहां घर के सभी सदस्य मिल बैठकर टीवी देखें और आपसे अपने अनुभव और विचार सांझा करें। आजकल तो बड़े सुन्दर सुन्दर ड्राइंग रूम होते हैं, जो घरों में आने वाले मेहमानों का ही इंतजार करते हैं, परन्तु वहां घर-परिवार के लोग भी तो कभी-कभार ही दिखाई पड़ते हैं। वैसे मोबाईल पफोन पर व्यक्तिगत बातें करने के लिए बड़ा सुविधाजनक स्थान हेाता है - आपका ड्राइंग रूम....।साथ साथ बैठने बात करने के अवसर तो बहुत कम ही घर में मिलते हैं। हमको आपको, आजकल तो हर कोई अपने बैडरूम में टीवी से अपनी आंखें चिपकाए दिखता है.....। इन आधुनिक सुविधाओं ने तो खुशी के नाम पर हमारी पारिवारिक सुख शांति और सह अस्तित्व की भावना को ही ग्रहण लगा दिया है। अगर हम सब साथ बैठे होते तो हो 

सकता था कि सभी मिलकर किसी एक टीवी प्रोग्राम को देखने पर 
एकमत हो जाते। यह भी हो सकता था कि अपनी-अपनी पसंद का 

विवाद होने की स्थिति में समाधान के लिए घर की मुखिया की बात को अंतिम निर्णय मानकर सब साथ होते। हमारे अलग-अलग शयन कक्षों ने तो हमें इस हद तक बांट दिया है कि हमारे अंदर से सहनशीलता और दूसरे विचारों से सांमजस्य बनाने की क्षमता ही समाप्त होती जा रही है।

3. बैंक खाते: घर परिवार े सभी धन कमाने वाले सदस्यों ने अपने पूर्णतः व्यक्तिगत खाते खुलवा रखे हैं और उनमें आपस में समय पर खर्च न करने की होड़ सी लगी होती है। कोई किसी पर आश्रित नहीं है और यह उनकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। इस पूर्ण स्वतन्त्राता ने घरों के अंदर की एकता को छिन्न भिन्न कर दिया है। वास्तव मे, आज तो नगरों घर है नहीं, ये तो सभी मकान है....फ्रलैट या पेइंग गेस्ट हाॅस्टल जैसी जगहे हैं.....।

आजकल के 20-30 साल के नौजवानों की घर की समझ को तो शायद आधुनिकता की नजर लग गई है। उन्हें पुरानी घर परम्परा के बारे में तो किसी ने बताया सिखाया नहीं और न ही उन्हें कुछ वैसा शहर में देखने को मिला। उनके लिए तो अपनी स्वतन्त्राता और निजता ही अधिक मायने रखती है। उनकी दुनिया बस उनके अपने दोस्तों तक है, बाकी सारे संबंध तो महत्वहीन या गौण हैं।

अभी हाल ही में, मैंने कुछ हफ्रतों का समय एक ग्रामीण परिवार के संग बिताया, जहां मुझे लगा कि मैं स्वर्ग में हूं भले ही वह एक गांव था। उस परिवार के मुखिया का सम्मान, उस घर के सभी सदस्य बिना कहे ही कर रहे थे। किसी को कुछ भी बताने या कहने की जरूरत ही नहीं थी। ‘घर की समझ’ के साथ वास्तव में पूरी तरह यही उचित वंशानुक्रम (वंश में श्रेष्ठता क्रम) का एक सवोत्तम उदाहरण था। अलग-अलग बेडरूमों या शयनकक्षों की उन लोगों के लिए, जिन्होंने पुरानी परम्पराओं का समय देखा है और घर परिवार का अर्थ सही मायने में जानते हैं उनकी इन मूल्यों के प्रति समाज को जागरूक करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आज इस बात की जरूरत है कि स्कूल और घरों में बच्चों को इन जीवन मूल्यों को सिखाया जाये। कुछ लोग कह सकते हैं कि सेवा, अनुक्रम, सम्मान आदि पुरातनपंथी विचार है, परन्तु आज इसी पुरातन की अति आवश्यकता है। अतः इससे पहले कि हम जीवन की अंधी दौड़ में बहुत दूर निकल जाएं, अच्छा होगा कि आ अब हम लौट चलें....।



Wednesday, 26 July 2017

राष्‍ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद का प्रोफाइल

राष्‍ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद का प्रोफाइल

नई दिल्ली : 26 जुलाई (National24news) सार्वजनिक जीवन और समाज में समतावाद तथा अखण्‍डता के पैरोकार रहे वकील, दिग्‍गज राजनीतिक प्रतिनिधि श्री रामनाथ कोविंद का जन्‍म 01 अक्‍टूबर, 1945 को उत्‍तर प्रदेश में कानपुर के निकट परौंख में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री मैकूलाल और माता का नाम श्रीमती कलावती था।

 25 जुलाई, 2017 को भारत के 14वें राष्‍ट्रपति का कार्यभार ग्रहण करने से पहले श्री कोविंद ने 16 अगस्‍त, 2015 से 20 जून, 2017 तक बिहार के 36वें  राज्‍यपाल के रूप में अपनी सेवा दी ।

शैक्षिक योग्‍यता और व्‍यावसायिक पृष्‍ठभूमि

    श्री कोविंद ने अपनी स्‍कूली शिक्षा कानपुर में ग्रहण की और कानपुर विश्‍वविद्यालय से बी.कॉम त‍था एलएलबी की डिग्री हासिल की। 1971 में उन्‍होंने दिल्‍ली बार काउंसिल के साथ एक वकील के रूप में नामांकन किया।

   श्री कोविंद 1977 से लेकर 1979 तक दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय में केन्‍द्र सरकार के वकील रहे तथा 1980 से 1993 तक उच्‍चतम न्‍यायालय में केन्‍द्र सरकार के वकील रहे। 1978 में वे उच्‍चतम न्‍यायालय के ‘एडवोकेट-ऑन-रिकार्ड’ बने। 1993 तक उन्‍होंने कुल 16 साल तक दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय और उच्‍चतम न्‍यायालय में वकालत की।

संसदीय और सार्वजनिक जीवन

   श्री कोविंद को अप्रैल, 1994 में उत्‍तर प्रदेश से राज्‍यसभा का सदस्‍य चुना गया। उन्‍होंने लगातार दो बार राज्‍यसभा के सदस्‍य के रूप में मार्च, 2006 तक कार्य किया। श्री कोविंद ने विभिन्‍न संसदीय समितियों जैसे अनुसूचित जाति/जनजाति कल्‍याण संबंधी संसदीय समिति, गृह मामलों की संसदीय समिति, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर संसदीय समिति, सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति और कानून और न्‍याय संबंधी संसदीय समितियों में सेवा की। वह राज्‍यसभा हाउस कमेटी के चेयरमैन भी रहे।

   श्री कोविंद बी.आर. अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय के प्रबंधन बोर्ड के सदस्‍य तथा भारतीय प्रबंधन संस्‍थान कोलकाता के बोर्ड ऑफ गवर्नस के सदस्‍य भी रहे। वह संयुक्‍त राष्‍ट्र में गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्‍य भी रहे और अक्‍टूबर, 2002 में संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा को संबोधित किया।

इन पदों पर किया कार्य -

2015-17: बिहार के राज्यपाल

1994-2006: उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य

1971-75 और 1981: महासचिव, अखिल भारतीय कोली समाज

1977-79: दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के वकील

1982-84: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के अधिवक्‍ता

व्‍यक्तिगत विवरण

    श्री कोविंद का विवाह 30 मई, 1974 को श्रीमती सविता कोविंद से हुई। श्री कोविंद के पुत्र का नाम प्रशांत कुमार और पुत्री का नाम सुश्री स्‍वाति है। पढ़ने-लिखने के शौकिन राष्‍ट्रपति कोविंद को राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों, कानून और इतिहास तथा धर्म संबंधी किताबें पढ़ने में गहरी दिलचस्‍पी है।

   अपने लम्‍बे सार्वजनिक जीवन के दौरान श्री कोविंद ने कई देशों की यात्रा की है। संसद सदस्‍य के रूप में उन्‍होंने थाईलैंड, नेपाल, पाकिस्तान, सिंगापुर, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा भी किया है। 

Saturday, 22 July 2017

बरसात में फूड और जल जनित बीमारियां से बचाव के लिए अपनाएं आयुर्वेदिक नुस्खे :डाॅ प्रताप चौहान  निदेशक जीवा आयुर्वेद

बरसात में फूड और जल जनित बीमारियां से बचाव के लिए अपनाएं आयुर्वेदिक नुस्खे :डाॅ प्रताप चौहान निदेशक जीवा आयुर्वेद

फरीदबाद: 22जुलाई (National24news) तापमान में अचानक परिवर्तन होने के कारण हमारे शरीर की प्रतिरक्षा कम हो जाती है जो हमें कई रोगों के लिए अतिसंवेदनशील बनाता है। 
बरसात के मौसम में संक्रमण और दूसरी अन्य स्वास्थ्य संबंधी गंभीर बीमारियां  पनपने लगती है।
लगातार कई महीने तक झुलसाने वाली सूर्य की तपस से राहत मिलने के दिन आ गए हैं क्योंकि मानसून आने से लगभग हर जगह बारिस का सिलसिला शुरू हो गया है।  यकीनन इससे हमारी बाॅडी और स्किन दोनों को बड़ी राहत मिलेगी। इसके अलावा सूर्य की तेज किरणें, सनबर्न, डिहाईड्रेशन की गंभीर समस्या से भी निजात मिलना तय है। बूंदा बादी और पानी की बौछार से हमारे शरीर को बहुत शीतलता मिलती है लेकिन शरीर के लिए इस अचानक हुए मौसमी परिवर्तन के कारण परेशानी शुरू होने लगती है। जिसकी वजह से लोगों के कई बीमारियों से ग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है। 

बरसात के मौसम में फूड और जल जनित बीमारियां जैसे टायफायड, गैस्ट्रोएन्टेरिटिसिस, फूड विषाक्तता, हेपेटाइटिस ए एंड ई और डायरिया में तेजी दिखाई देती है। स्थाई बारिश के पानी के कारण मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया के मामले भी बढ़ जाते हैं। मॉनसून सर्दी, फ्लू, और गले और छाती के संक्रमण जैसे वायरल के लिए जलद्वार खोल देता है। ऐसे में एहतियाती उपायों को अपनाना बहुत महत्वपूर्ण है।

जीवा आयुर्वेदा केे निदेशक डाॅ प्रताप चौहान  के अनुसार गर्मी के जाते ही बरसात का मौसम शुरु हो जाता है। बारिस के आगमन से लोगों को गर्मी से राहत तो मिलती है, परंतु साथ ही उन्हे स्वास्थय से जुड़ी कई बड़ी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। तापमान मे अचानक बदलाव के कारण हमारी रोग प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है। जिससे हम बिमारीयो के चपेट मे जल्दी आते है। इस मौसम में बाहर का चटपटा खाना जितना अच्छा लगता है वह उतना ही नुकसानदेह भी होता है। इन दिनों फिट रहने के लिए खाने की आदत पर अतिरिक्त ध्यान देना चाहिए, क्योंकि मानसून में दूसरे मौसम की तुलना में पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। पाचन तंत्र के कमजोर होने से हमारे शरीर का मेटाबोलिजम कम हो जाता है जो वजन बढ़ने का प्रमुख कारण होता है। इस वजह से पेट की बीमारियों के साथ दूसरी कई बीमारियां के प्रबल होने की आशंका बढ़ जाती हंै। 

ऐसे रख सकते है हम मानसून के दौरान अपने सेहत का ख्याल-

गहरे तेल में तला हुआ, जंक फूड, ज्यादा गर्म, खटृा और नमकीन भोजन को खाने से बचना चाहिए क्योंकि बरसात के समय हमारी पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है। 

मनसून में हल्के और आसानी से पचने वाले खाद्य पदार्थ, पकी हुई या स्टीम सब्जियां, कददू, फल, मूंग दाल, खिचड़ी,काॅर्न, काबुली चने का आटा और ओटमील आदि खाने चाहिए। इसके अलावा कच्चे सलाद की जगह स्टीम सलाद लेना चाहिए।

मानसून में बहुत अधिक भारी, गर्म, खट्टे जैसे चटनी, अचार, मिर्ची, दही, करी आदि खाद्य पदार्थों को खाने से वाटर रिटेंशन, अपचन, एसीडिटी और पेट दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए तले हुए पदार्थ, जंक फूड, मिर्च मसालों से भरपूर खानो से बचना चाहिए। 

कसैला स्वाद पित्त को निष्प्रभावित करने में मदद करता है। इसलिए कड़वी सब्जियां जैसे करेला और कड़वी जड़ी-बूटियां जैसे नीम, सूखी मेथी और हल्दी अधिक खाएं। इसके अलावा ये सब चीजें आपको संक्रमण से बचाती हैं।

मानसून में गरम हरबल चाय पीना चाहिए क्योेकि ये जीवाणुरोधी होते है।

सब्जियो और फलो को अच्छे से धो कर ही इस्तेमाल करना चाहिए।

मानसून के समय हमे पत्तेदार सब्जियां और सलाद खाने से बचना चाहिए क्योकि इस मौसम में बैक्टीरिया अधिक होते हैं जो हमें बीमार कर सकते है।
हप्ते मे कम से कम दो बार तिल के तेल से अपने शरीर की मालीश करना चाहिए ये बरसात के दौरान शारीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। जिन लोगो को तिल का तेल शूट नहीं करता उन्हे नारियल के तेल का इस्तेमाल करना चाहिए।
बरसात के दौरान हमें ज्यादा मेहनत वाले व्यायाम जैसे दौड़ना, तेज साईकिल चलाना, हाईकिंग से बचना चाहिए क्योकि ये भी पित (गर्मी) को बढ़ाने का काम करते है। इसकी बजाय योग, सुबह की सैर, तैराकी और स्ट्रेचिंग करें 
जब भी खाना खाए तब हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वो जगह साफ सूथरी हो। बरसात के दौरान ऐसा कुछ भी खाने से बचना चाहिए जो खुले में रखा हो और ठेले व खमुचे वालो से खाने से बचना चाहिए।
बरसात के दौरान हमे सरसो का तेल, फली का तेल, मक्खन और ऐसे तेल के उपयोग से बचना चाहिए जो शरीर को गरम करता है। इनके बदले हमे सनफलावर आयल, कार्न आयल, घी, ओलिव आयल का ही खाना बनाने में उपयोग करना चाहिए।

स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मन निवास करता है। यह वही है जिस पर हम विश्वास करते हैं और अपने शरीर को देखभाल को लेकर आपको कभी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। इसलिए स्वयं और अपने प्रियजनों को सुरक्षित और स्वस्थ रखें और सुंदर मौसम का आनंद लें।

जीवा आयुर्वेद के बारे में
जीवा आयुर्वेद को असाध्य कही जाने वाली और अनेक लाइफस्टाइल बीमारियों जैसे आर्थराइटिस और अन्य जोड़ों के दर्द व हड्डियों के विकार, पाचन की तकलीफें, हाइपरटेंशन, मधुमेह, स्त्री रोग व त्वचा रोग के उपचार में विशेषज्ञता हासिल है। जीवा आयुर्वेद अपने टेलीमेडिसिन सेंटर और क्लीनिकों के जरिए हर महीने करीब 25 हजार रोगियों तक पहुंचता है। जीवा आयुर्वेद टेलीमेडिसिन सेंटर, फरीदाबाद, हरियाणा दुनिया में अपनी तरह का अकेला ऐसा हेल्थ सेंटर हैं, जहां 300 से अधिक आयुर्वेदिक डॉक्टर और सलाहकार देश के 1200 छोटे-बड़े शहरों के रोगियों को सलाह देते हैं। जीवा एमआरसी, क्लिनिक और 600 औषधीय योगों के माध्यम से जीवा आयुर्वेद हर महीने 25,000 से अधिक रोगियों तक पहुंचता है।

Tuesday, 18 July 2017

बालों के झड़ने के इलाज में होम्योपैथी की भूमिका: डॉ.अभिषेक कसाना

बालों के झड़ने के इलाज में होम्योपैथी की भूमिका: डॉ.अभिषेक कसाना

फरीदबाद: 19 जुलाई (National24news) बालों का झड़ना एक प्रक्रिया है जो हर रोज़ होता है। एक ही दिन आप कर सकते हैं  पचास से सौ बाल के बीच कहीं भी खो दें लेकिन, चूंकि इसे बदल दिया गया है हर रोज़, हम शायद ही कोई अंतर देखते हैं। अलार्म घंटी हालांकि, शुरू जब बाल गिरने की दर बालों की दर से तेज होती है, तब बजती है विकास। इससे बालों को कम करने और अंततः, गंजापन हो सकता है परंतु, ऐसे तरीके हैं जो आप बालों के झड़ने को रोकने के लिए उपयोग कर सकते हैं। एक स्वस्थ बनाए रखना जीवनशैली प्राकृतिक बालों के झड़ने की रोकथाम के लिए सबसे अच्छा उपाय है - एक संतुलित आहार खाएं, अच्छा व्यायाम करें, अच्छी तरह सोएं और जंक फूड से बचें
और अपने बालों पर रासायनिक उपचार।


1) टिनिया कैपिटास, सेबोरहाउआ (रूसी), खोपड़ी की एक्जिमा, या लिकेंस प्लिनस के रूप में जाना जाता स्कैल्प के फंगल संक्रमण जैसे खोपड़ी को प्रभावित करने वाली त्वचा रोग।

2) आनुवंशिक कारक

3) हार्मोनल परिवर्तन जिनमें बच्चे के जन्म के दौरान और रजोनिवृत्ति के दौरान होने वाले उन लोगों सहित

4) एक आहार के कारण पोषक तत्वों की कमी, जो लोहे की कमी होती है (एनीमिया के लिए अग्रणी), और प्रोटीन सेवन की कमी भी।

5) तीव्र बुखार जैसे टाइफाइड और इरिस्पिल्स से प्राप्त होने से बालों के झड़ने को फैलाना होता है

6) ड्रग उन लोगों की तरह उपयोग होती है जिनका उपयोग उच्च रक्तचाप, संयुक्त दर्द, कैंसर या अवसाद के इलाज में किया जाता है। एनाजेन फफूवियम कैंसर रोगी में कीमोथेरेपी के कारण बालों के झड़ने की स्थिति को संदर्भित करता है।

7) शारीरिक चोट / सिर को चोट

8) एक पारिवारिक सदस्य / करीबी दोस्त की हानि के कारण लगातार तनाव या दुःख जैसे भावनात्मक आघात

9) सामान्य बीमारियों जैसे मधुमेह रोग, तपेदिक, हाइपोथायरायडिज्म, या एड्स।

10) स्वत: प्रतिरक्षा संबंधित बालों के झड़ने जिसमें बालों की कोशिकाओं को एक विदेशी शरीर के लिए गलत किया जाता है और शरीर के प्रतिरक्षा कोशिकाओं द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।

11) हेयरस्टाइल जैसे तंग ब्रैड्स या पॉनीटेल, जहां बाल कसकर पीछे की तरफ खींचते हैं, जो कर्षण की खाई के लिए अग्रणी होते हैं; बालों के रंगों और बालों के सीधा संबंधों के अंधाधुंध उपयोग

12) त्रिचीोटिलोमानिया, जो एक मानसिक विकार है जिसमें प्रभावित व्यक्ति स्वेच्छा से उसकी / उसके खोपड़ी के बाल बाहर खींचती है।

1. पी बैलेंस
2. डी-टोकिफिकेशन और स्कैल्प उपचार
3. नए विकास के लिए विकास कारक
होम्योपैथिक उपचार के शुरुआती चरण के दौरान हमें आहार में ज्यादा आवश्यकता नहीं है, बस एक अच्छा संतुलन आहार लेने की कोशिश करें और निम्नलिखित का पालन करें: -
I) स्वस्थ आदतें: प्राकृतिक बालों के झड़ने की रोकथाम के लिए पौष्टिक भोजन की बहुत महत्वपूर्ण है। एक स्वस्थ और संतुलित आहार सभी को प्रदान करता है

स्वस्थ स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक विटामिन और खनिज प्राकृतिक बाल
हानि की रोकथाम संभव है यदि आप प्रोटीन में समृद्ध आहार शामिल करते हैं,
कैल्शियम, आयोडीन, लोहा, मैग्नीशियम, सेलेनियम, सल्फर, सिलिका और जस्ता।

Ii) समुद्री भोजन, चावल, साबुत अनाज, सोया, हरे रंग की नियमित और संतुलित मात्रा में
सब्जियां, प्याज, मांस, मछली, शराब बनानेवाला के खमीर और डेयरी उत्पाद दे
आप सभी आवश्यक विटामिन और खनिज अपने बालों को स्वस्थ रखने के लिए

इसके अलावा जंक फूड और कैफीन से बचें

Iii) स्वस्थ में स्कैल्प सहायता के भोजन, सफाई और मालिश के अलावा
बालों की बढ़वार। बाहरी सफाई खोपड़ी से और गंदगी को हटा देती है
गंभीर बालों के झड़ने की स्थिति

Iv) आपको शरीर के आंतरिक निराकरण की आवश्यकता हो सकती है। विषाक्त पदार्थों कर सकते हैं
शरीर के सिस्टम पर प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं जिसके परिणामस्वरूप सिरप रोग होते हैं।

V) मालिश से बालों के रोम में खून का प्रवाह बढ़ता है और इससे मदद मिलती है
बालों के झड़ने बंद करो

Vi) प्राकृतिक बालों के झड़ने की रोकथाम में व्यायाम भी प्रमुख भूमिका निभाता है।
व्यायाम शरीर के सभी प्रणालियों में रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है और
हर अंग स्वस्थ रहता है उस पर अप्रत्यक्ष रूप से सकारात्मक प्रभाव पड़ता है
आपके बाल।

Vii) शरीर को स्वस्थ होने के लिए नींद आवश्यक है और यह भी एक है
आपके सिर पर अप्रत्यक्ष लेकिन सकारात्मक प्रभाव

Viii) उचित बालों की देखभाल बालों के झड़ने को रोक सकती है और आपको गंजे बनने से बचा सकता है।
बालों के झड़ने हार्मोन या वंशानुगत कारकों के प्रभाव के कारण हो सकते हैं।
बालों के झड़ने के कारण बालों का इलाज, बालों पर रासायनिक उपयोग,
बीमारी, भोजन सेवन में पर्याप्त विटामिन और खनिजों की कमी और
मानसिक तनाव।

बाल गिरने के नियंत्रण के लिए कुछ महत्वपूर्ण और सरल सुझाव यहां दिए गए हैं।

1. अपने बाल से तेल लगाने से पहले कम से कम दो बार सो जाओ।
और इसे पूरी तरह से तेल मुक्त रखने के लिए अगली सुबह इसे धो लें नियमित
तेल के आवेदन को मजबूत जड़ों मजबूत रखता है

2. अपने बालों को बारिश में गीला न होने दें।

3. हमेशा अपने चेहरे को कुछ या दूसरे समय के साथ कवर करने की कोशिश करें
बाइक पर सवारी यह आपके बालों को खतरनाक प्रदूषण से बचाता है
4. स्नान के तुरंत बाद गीली बाल को तलाक से बचें।

5. अपने बालों को सूखने के लिए बालों की सूखे का प्रयोग न करें क्योंकि यह आपके बालों को नुकसान पहुंचा सकता है

और इसे बहुत शुष्क बनाते हैं
6. अपने बालों को कभी भी बहुत ठंडा या बहुत गर्म पानी से न धोएं। यह
आपके सिर और

डॉ.अभिषेक कसाना   बीएचएमएस, सीएफ एन-दिल्ली,
                                  डी.आई (होम) लंदन, पीजी डी पी एच एच चेन्नई,
                                  एमडी होम्योपैथी
 पूर्व वरिष्ठ सलाहकार और केंद्र प्रमुख Bakson होम्योपैथी एलर्जी केंद्र

Monday, 3 July 2017

हम मार देते हैं (उनकी) जिज्ञासा : कुलदीप सिंह

हम मार देते हैं (उनकी) जिज्ञासा : कुलदीप सिंह

फरीदाबाद : 3जुलाई(National24news) हम आज एक विशेष क्षेत्रा में अपनी पहचान बना रहे हैं - मेरा संकेत आजकल के अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों से है। अधिकांश परिवारों के लोग भारत में घर में अपनी घरेलू भाषा में ही बात करते हैं परन्तु अपने छोटे-छोटे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। क्यों?

ये (तथाकथित) अंग्रेजी स्कूल तो मोह पाश के मायाजाल की तरह हैं जो देखने में बहुत सुन्दर और आकर्षक लगते हैं परन्तु छोटे बच्चों की जिज्ञासा और कौतूहल को अनजाने में मार देते हैं। खूबसूरत यूनिपफार्म में सजा-धजा बच्चा स्कूल की अपनी उस कक्षा के कमरे में घुसरता है जहां न केवल उसके घूमने पिफरने पर बंदिशे हैं। उस कमरे से बिना पूछे बाहर नहीं जा सकता बल्कि एक ऐसे भाषा माध्यम से उसका सामना होता है जिसे वह नहीं क बराबर जानता है। कितना कष्टकारक होगा यह दृश्य कल्पना कीजिए आप कुछ ऐसे लोगों से घिर गए हो- जो केवल पश्तो (अनजानी) भाषा में ही बोल रहे हो और आप....।

 फिर भी वह बच्चा तेा बहुत उदार है जो ऐसी पिफल्म के दृश्यों को देखने समझने का साहस करता है जिसे वह समझता ही नहीं। शायद वह इसे ऐसे रोमांचक कार्य के रूप में लेता है। जिसमें उसे लगता है कि एक दिवस ऐसा भी होगा। जब वह इस भाषा अवरोध को पार कर लेगा चले चलो...। जो कुछ भी हो, थोड़े समय में ही उसके दिमाग में अर्थहीन अंकों और तुकबंदियों की भीड़ लग जाती है लेकिन अपनी क्लास के सहपाठियों की दोस्ती के सहारे शायद वह अपनी अरूचिकर आनंदविहीन यात्रा जारी रखता है। जहां उसे खिलौने खेलने और उछलकूद के अवसरों की आशा होती है। चतुर्दिक हरियाली से लेकर अपनी क्लास तक के भिन्न-भिन्न वातावरण से वह भिन्न-भिन्न बातें सीखता है। उसका इम्तिहान लिया जाता है। उसे प्रश्न पत्रा हल करने को दिया जाता है, भले ही वह उसे पढ़ नहीं सकता तो क्या हुआ। उसका शिक्षक उसे बताता है कि उसे क्या करना है। उसे इस तरह का होमवर्क मिलता है जिसे वह खुद नहीं कर सता और आशा यह की जाती है कि वह करके लाए और उस पर सर्दियों में भी सुबह जल्दी-जल्दी उठना और स्कूल बस पकड़ने की आपाधापी...।

जिन्दगी बहुत कठिन....पर दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। अगर बच्चों को बाहर घूमने दौड़ने की आजाद दे दी जाए तो क्लास में किसी बच्चे को बैठा देख मुझे आश्चर्य ही होगा (यदि वह स्वस्थ है तो) क्या हम ऐसे स्वस्थ शिक्षण तंत्रा का विकास नहीं कर सकते। जहां अधिक आजादी हो और जहां बच्चे को इतस तरह पढ़ाया जा सके। जिससे उसकी सीखने की जिज्ञासा और कौतूहल को जानने का भाव अर्थपूर्ण ढंग से तजी से बढ़ सके।


जी हां यह संभव है यदि प्रगतिवादी स्कूल, बच्चों की उम्र को ध्यान में रखते हुए स्वस्थ, यथार्थपरक ओर गुणवत्तायुक्त मूल्य परक शिक्षा प्रदान करने के लिए ऐसी संभावनाओं पर ईमानदारी से विचार करें जो उचित समाधान और हल प्रदान कर से। परिणाम बहुत ही उत्तम होगा। यूरोपियन स्कूल इसके उदाहरण है। भारत में भी कुछ ऐसे स्कूल है परन्ु उनकी संख्या बहुत ही कम है। भारत के अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों ने अभिभावकों को भी इस हद तक दिगभ्रमित कर दिया है कि वे भी इस अंधी दौड़ में शामिल होने में बहुत गर्व महसूस करते हैं और अपने नन्हें अबोध बच्चों को भविष्य का आईस्टाइन बनते देखने का दिवास्वप्न पाले हुए हैं - जो कभी भी नहीं होने वाला।

Monday, 22 May 2017

सफेद दाग से अब मिलेगा छुटकारा और फोटोथेरेपी ने बढ़ाया आत्मविश्वास :डॉ. अमित बांगिया

सफेद दाग से अब मिलेगा छुटकारा और फोटोथेरेपी ने बढ़ाया आत्मविश्वास :डॉ. अमित बांगिया

फरीदाबाद: 22 मई(National24news.com) सफेद दाग एक ऐसी समस्या है जो लोगों का आत्मविश्वास कम कर देती है। वो अपने दोस्त-रिश्तेदारों से मिलने से कतराते हैं। अकेले रहना पसंद करते हैं। वे किसी पार्टी-शादी या अन्य किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लेते। यहां तक कि वे अपने बच्चों या साथियों के साथ छुट्टियां बिताने के लिए या घूमने के लिए भी कहीं नहीं जाते, लडक़े अपने दाग छुपाने के लिए दाढ़ी रखते हैं तो लडकियां स्टॉल से अपना मुंह छुपाती हैं। पूरी बाजू के कपड़े पहनते हैं ताकि उनके शरीर पर फैले हुए सफेद दाग किसी को दिखाई न दे। खासकर चेहरे के दाग के कारण लोग चिड़चिड़ापन और तनाव के शिकार हो जाते हैं।

विटिलिगो नाम की इस बीमारी से पीडि़त मरीज महीनों ही नहीं कई सालों तक इसके इलाज के लिए डॉक्टरों के पास चक्कर लगाते हैं। होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक सभी तरह की दवाईयां लेते हैं, लेकिन आराम न मिल पाने के कारण निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे ही दिल्ली निवासी अनोज  कुमार सिंगला भी आठ- दस सालों तक डॉक्टरों के चक्कर लगाकर परेशान हो चुके थे। 

अनोज  को उनके एक दोस्त ने फरीदाबाद स्थित एशियन अस्पताल के त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित बांगिया के बारे में बताया। वे जब डॉ. बांगिया से मिले  तो डॉक्टर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके ये दाग जल्द ही उनका साथ छोड़ देेंगे। इसके लिए थोड़ा समय लगेगा। डॉ. बांगिया द्वारा दिए गए निर्देशानुसार अनाूज ने इलाज लिया और दो महीने के भीतर अनोज के चेहरे के सभी सफेद दाग साफ हो गए। अब अनोज  पूरे आत्मविश्वास के साथ सेल्फी भी लेते हैं और सभी कार्यक्रमों  में भी भाग लेते हैं। 

एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल के त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ.अमित बांगिया ने बताया कि त्वचा पर सफेद धब्बे या तो पिगमेंट्स में विकार होने के कारण होते हैं। यह एक जेनेटिक समस्या भी हो सकती है। फोटोथेरेपी ट्रीटमेंट प्रकाश के माध्यम से इलाज करने वाली थेरेपी है। जो कुछ खास नेरोबैंड किरणों के इस्तेमाल से की जाती है। यूवीबी प्रकाश के उत्सर्जन के लिए खास तरह की मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस ट्रीटमेंट का इस्तेमाल त्वचा संबंधी अनेक समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। ये किरणें पिगमेंट को त्वचा के रंग में परिवर्तित कर देती हैं। इससे सफ ेद दाग को त्वचा के रंग में बदल जाती है। 

डॉ. बांगिया ने बताया कि फोटोथेरेपी ट्रीटमेंट चेहरे पर होने वाली एलर्जी या एक्जि़मा आदि पर होने वाली खुजली को कम करता है। सूजन कम करता है। शरीर में हो रही विटामिन डी की कमी को पूरा करता है। इसका उपचार लंबे समय तक चलाया जा सकता है और आराम पहुंचाता है। उन्होंने बताया कि पिछले 10 साल में 1200 से ज्यादा मरीजों को सफेद दाग से छुटकारा दिलाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया है। 

Tuesday, 16 May 2017

कम उम्र में हो रहे हाइपरटेंशन के शिकार : डॉ. आशु

कम उम्र में हो रहे हाइपरटेंशन के शिकार : डॉ. आशु

फरीदाबाद:16मई(National24news.com) बदलती हुई जीवनशैली में कई ऐसी बीमारियां जो उम्र से पहले ही हमारे शरीर में घर कर रही हैं। इनमें से एक मुख्य बीमारी है उच्च रक्तचाप, जिसे आम भाषा में हम हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन के नाम से भी जानते हैं। इसका कारण इसके नाम में ही छिपा है। हाइपरटेंशन यानि तनाव। नौकरी में काम का तनाव, पढ़ाई का तनाव, एडमिशन का तनाव, बच्चों की पढ़ाई का तनाव और न जाने कितने तरह के तनाव और यही तनाव रूप दे रहा है हाइपरटेंशन शनि ब्लड़ प्रेशर को।

डॉक्टरों की मानें तो बदली जीवनशैली और तनाव हाई ब्लड प्रेशर का मुख्य कारण है। योग या व्यायाम के लिए समय न होना, बाहर का खाना खाना, शारीरिक श्रम न करना, सिगरेट व शराब का सेवन तनाव की स्थिति में ब्लड प्रेशर को बढ़ाने में मुख्य भूतिका निभाता है।

एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के कंसलटेंट डॉ. आशु अरोड़ा का कहना है कि आजकल २० से ३० वर्ष की उम्र में भी कई हाई ब्लड प्रेशर के मामले सामने आ रहे हैं। इतना ही नहीं कई बार हार्ट अटैक और ब्रेन अटैक भी कम उम्र में देखने को मिल रहा है जिसका मुख्य कारण है हाई ब्लड प्रेशर।

 डॉ. आशु का कहना है कि सुबह जल्दी उठकर योगञ्चव्यायाम और सैर करनी चाहिए। सुबह उठकर खाली पेट कम से कम तीन गिलास पानी पीना चाहिए। अपने खाने में फल व हरी सब्जियों का अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए। नमक कम खाना चाहिए। जहां तक हो सके बाहर का जंकफूड व तेल-मसाले से युक्त भोजन से परहेज करें। यदि तनाव में हैं तो अपने परिवारजनों या निकटतम दोस्त से खुलकर बात करें। ऐसा करने से तनाव कम होगा। वजन को नियंत्रित रखना चाहिए।

Tuesday, 2 May 2017

प्रदूषण बढ़ा रहा है सांस के रोगियों की समस्या: डॉ. मानव

प्रदूषण बढ़ा रहा है सांस के रोगियों की समस्या: डॉ. मानव

 
फरीदाबाद: 2 मई (National24news.com) आजकल प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण दमा का खतरा भी काफी बढ़ गया है। आसपास के परिवेश में बढ़ते प्रदूषण के स्तर के कारण शुद्ध वायु की कमी हो गई है जिसका सबसे ज्यादा असर दमा के मरीजों पर हुआ है। इनमें बच्चे और वृद्ध शामिल है इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। मौसम में बदलाव बच्चों को बीमारियां जल्दी ही अपनी चपेट में ले लेती है। ऐसे में बच्चों का खास ख्याल रखना चाहिए। अगर बच्चा स्कूल जाता है तो उसके स्कूल में उसका मेडिकल मुहैया कराना चाहिए। ताकि 

एशियन अस्पताल के श्वसन रोग विशेषज्ञ डॉ. मानव मनचंदा का कहना है कि गेहूं की कटाई वाले दिनों में सांस के रोगियों की समस्या बड़ जाती है। इसके अलावा शहर में चल रहे फ्लाईओवर के निर्माण कार्य के चलते बड़ रहे प्रदूषण के कारण दमा रोगियों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है। इनमें बच्चों से लेकर युवा और वृद्ध भी शामिल हैं। प्रतिदिन १५-२० वर्ष आयुवर्ग में ५, २०-२५ आयुवर्ग में १० और इससे अधिक आयुवर्ग के करीब ७ मरीज सांस संबंधी पेशानी लेकर उनके पास पहुंच रहे हैं।

डॉ. मानव का कहना है कि अस्थमा का अटैक आने के बहुत सारे कारणों में वायु का प्रदूषण भी एक कारण है। अस्थमा के अटैक के दौरान सांस की नली के आसपास के मसल्स में कसाव और वायु मार्ग में सूजन आ जाता है। जिसके कारण हवा का आवागमन अच्छी तरह से हो नहीं पाती है। दमा के रोगी को साँस लेने से ज़्यादा साँस छोडऩे में मुश्किल होती है। एलर्जी के कारण श्वसनी में बलगम पैदा हो जाता है जो सांस लेने में परेशानी और बढ़ा देता है। एलर्जी के अलावा भी अस्थमा होने के बहुत से कारण हो सकते हैं। 

इनमें घर के आस-पास धूल भरा वातावरण, वायु प्रदूषण, घर के पालतू जानवर, रुई के बारीक रेशे, गेहूँ, आटा, कागज की धूल, फूलों के पराग, सुगंधित सौन्दर्य प्रसाधन, सर्दी, धू्रमपान, अधिक मात्रा में शराब पीना, जंक फूड का अत्याधिक सेवन व्यक्ति विशेष का कुछ विशेष खाद्द-पदार्थों से एलर्जी, महिलाओं में हार्मोनल बदलाव, कुछ विशेष प्रकार के दवाएं, सर्दी के मौसम में ज़्यादा ठंड, एलर्जी के बिना भी दमा का रोग शुरू हो सकता है। इसके अलावा  तनाव या भय के कारण भी  सांस संबंधी समस्या हो सकती है।  
लक्षण-
सांस लेने में कठिनाई होती है।
सीने में जकडऩ जैसा महसूस होता है।
दमा का रोगी जब सांस लेता है तब एक घरघराहट जैसा आवाज होती है।
साँस तेज लेते हुए पसीना आने लगता है।
बेचैनी-जैसी महसूस होती है।
 सिर भारी-भारी जैसा लगता है।
जोर-जोर से सांस लेने के कारण थकावट महसूस होती है। स्थिति बिगड़ जाने पर उल्टी भी हो सकती है आदि। जब अस्थमा के लक्षण काबू में न हो या फिर अटैक पर दवाओं का असर नहीं हो रहा हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

उपचार-
दमा की दवा सदा अपने साथ रखें। 
सिगरेट-बीड़ी के धुंए से बचें।
जिन दवाओं, खाद्य पदार्थों और चीजों से आपको एलर्जी होती है उनसे दूर रहें।श्
सर्दी-जुकाम से पीडि़त मरीजों  के  संपर्क में जाने से बचें। 
खान-पान की ओर विशेष ध्यान दें।
तनाव से बचें।
धूल-प्रदूषण वाले स्थानों पर जाने से परहेज करें। 
नियमित व्यायाम करें। 
मौसम में बदलाव के साथ ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें। 







Wednesday, 26 April 2017

तेज धूप कही छीन न ले आपका निखार -- डॉ. अमित बांगिया

तेज धूप कही छीन न ले आपका निखार -- डॉ. अमित बांगिया

फरीदाबाद: 26 अप्रैल (National24news.com) सुबह और दोपहर में तेज धूप के कारण त्वचा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गर्मियां शुरू होते ही शरीर में पानी की कमी हो जाती है जिससे त्वचा और बालों संबंधी समस्याएं भी गंभीर रूप धारण कर लेती हैं। तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए। गर्मी के दिनों में लंबे समय तक धूप में काम करने या खड़े रहने से त्वचा संबंधी रोगों को बढ़ावा मिलता है। 

एशियन अस्पताल के सीनियर डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. अमित बांगिया ने बताया कि पहले लोग मई में धूप के कारण होने वाली त्वचा संबंधी समस्या लेकर आते थे, लेकिन इस वर्ष अप्रैल माह की शुरूआत में ही  इस समस्या के साथ अस्पताल में पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि गर्मी के दिनों में तेज धूप के संपर्क में आने से सन बर्न की समस्या आती है। इससे शरीर पर लाल थक्के बन जाते है। जो बाद में काले पडऩे लगते हैं और इनमें बहुत ज्यादा जलन होती है। लगातार धूप में रहने से पसीना आने के कारण हीट रैशेेज़ बन जाते हैं 

इनमें भी लगातार जलन होती है। जो लोग तैराकी करते हैं। उन्हें क्लोरीन केे पानी के कारण स्वीमर ईच का शिकार होना पड़ता है। त्वचा ही समस्या होने पर स्कीन एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। इसके अलावा सन एलर्जी भी एक गंभीर समस्या है, जोकि कुछ लोगों को सूरज की किरणों से होती है। इसमें पीडि़त के शरीर पर लाल दाने या खरोंच बन जाती हैं। यह शरीर के कुछ जैसे-मुंह, पीठ, गर्दन हाथ-पैर यानि धूप के संपर्क में आने वाले भागों को प्रभावित करती हैं। गंभीर स्थिति होने पर त्वचा पर छोटे-छोटे छाले या फफोले हो जाते हैं जो पूरे शरीर पर फैल जाते हैं। 

डॉ. बांगिया ने बताया कि इन दिनों हमारे पास रोजाना करीब ५० मरीज हीट रैश, फंगल इंफेष्ठशन, बैक्टीरियल इंफेष्ठशन और पिम्पल की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। गर्मियां शुरू होते ही शरीर में पानी की कमी हो जाती है जिससे त्वचा और बालों संबंधी समस्याएं भी गंभीर रूप धारण कर लेती हैं। तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए। गर्मी के दिनों में लंबे समय तक धूप में काम करने या खड़े रहने से त्वचा संबंधी रोगों को बढ़ावा मिलता है। बाल कमजोर हो जाते हैं और झडऩे लगते हैं। 

यह समस्या ऐसे लोगों में ज्यादा पाई जाती है जो गोवा जैसी जगहों से घूमकर आए हों या समुद्री एरिया के संपर्क में रहते हों। इसके अलावा लगतार बढ़ रही तेज धूप और प्रण्ूषण के कारण यह समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है। उन्होंने बताया की गर्मी, सेनीटेशन, फास्टफूड, हाईजीन और पसीना साफ न होने के कारण त्वचा पर इंफेष्ठशन का खतरा बढ़ जाता है।

हीट रैश से बचने के उपाय: इन समस्याओं से बचने के लिए धूप में कम से कम निकलने की कोशिश करें। अगर किसी कारण वश धूप में बाहर निकलना पड़ रहा है तो टोपी, छाता, सनगलासिस, सूती, ढ़ीले और पूरी बाजू के कपड़े पहनकर निकलना चाहिए, जो पसीना सोख सके। 

सन बर्न से बचने के लिए संस्क्रीन लोशन लगाकर धूप में निकलना चाहिए। हर चार घंटे के बाद या बाहर निकलने से २० मिनट पहले संसक्रीन लोशन लगाना चाहिए। एसपीएफ ५० लोशन विशेषज्ञों की सलाह लेकर ही इस्तेमाल करना चाहिए।

हीट रैश से बचने के लिए स्ट्रॉंग मॉश्चराइज़र और तेल लगाकर न निकलें।  इसके अलावा हैवी मेकअप का भी इस्तेमाल न करें। इससे पिम्पल भी हो सकतेे हैं। इनकी जगह कैलामाइन लोशन का इस्तेमाल करें। 
तैराक  विटामिन-सी लोशन लगाकर पानी में उतरें और  पानी से बाहर निकलकर विटामिन सी वॉश से साफ करें।

विटामिन-सी युक्त टैबलेट्स का सेवन करना चाहिए, जो ब्लड प्यूरीफाई करती हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। 

थोड़ी-थोड़ी देर के बाद और जितना हो सके उतना अधिक से अधिक पानी पीना चाहिए। कुछ लोग केवल प्यास लगने पर ही पानी पीते हैं इससे शरीर में पानी की पूर्ति नहीं हो पाती। पानी की कमी भयावह स्थिति उत्पन्न करती है। पूरे दिन में एक वयक्ति को कम सेे कम आठ गिलास पानी पीना चाहिए। 

शरबत, नारियल पानी, फ्रूट जूस आदि तरल पदार्थों और तरबूज, खरबूज, संतरा जैसे रसीले फलों का सेवन करना चाहिए। ठंडे पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। 

Friday, 14 April 2017

इंगलैंड में ही दस वर्षों तक अध्यापक कार्य किया --कुलदीप सिंह संस्थापक प्रधानाचार्य

इंगलैंड में ही दस वर्षों तक अध्यापक कार्य किया --कुलदीप सिंह संस्थापक प्रधानाचार्य

फरीदाबाद : 14अप्रैल (National24News.com) लेखक परिचय: पंजाब विश्व विद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त  कुलदीप सिंह ने इंगलैण्ड के वार्षिक विश्व विद्यालय तथा हाॅमर्टन काॅलेज कैम्ब्रिज से टीचर ट्रेनिंग प्राप्त की और इंगलैंड में ही दस वर्षों तक अध्यापक कार्य किया। बाद में फरीदाबाद (हरियाणर) के सैक्टर-21ए में हाॅमर्टन ग्रामर स्कूल के संस्थापक प्रधानाचार्य बने। आपको पचास वर्षो की टीचिंग का अनुभव है।विषय संदर्भ: इज देयर रियली अ प्राॅब्लम? (दि हिन्दू में 27.03.2017 को प्रकाशित) यह मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि आधारगत तत्वों से संबंधित है।वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक द्वारा गणित संबंधी समस्याओं के संदर्भ मे प्रस्तुत विचार रूचिकर लगे।

मुझे रूचिकर लगने का कारण संभवतः प्रयुक्त भाषा थी। जो संभवतः किसी भी पाठक के लिए सहजता से समझ में न आ सकी। लेखक ने आज कल के अनुपयोगी एवं अकुशल गणित शिक्षकों के बारे में कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि घटाने का एक साल 203 से 167 घटाना साक्षात्कारों के दौरान बी.एस.सी. (आनर्स), एम.एससी (मैथस) डिग्री धारी लोगों को दिया गया और बहुत बार मे।ने उनका परीक्षण किया परन्तु एक भी प्रतियोगी तार्किक और बु;िमतापूर्ण ढंग से मुझे संतुष्ट नहीं कर सका। अतः समस्या गणित विषय के साथ नहीं, समस्या उस तंत्रा के साथ है जो बहुत भयवाह है। 

आजकल हम नर्सरी और प्राईमरी के बच्चों से बहुत अपेक्षाएं रखते हैं। परन्तु एक दहाई का सारा संदर्भ समझाने के लिए पर्याप्त समय भी देते। अधिकांश टीचर एक और शून्य मिलकर दस है ‘पढ़ाते हैं और अच्छा की जगह बुरा कर देते हैं। अधिकांशतः टीचर दो, तीन और तीन ‘दो’ का अंतर समझाने में पिछड़ जाते हैं। हमारा ध्यान तो मात्रा उत्तर ‘6’ (छह) पर ही होता है और वही लक्ष्य रह जाता है। कोई भी किताब खोलकर दखे लीजिए, क्षेत्रापफल लिखा होता है बीस मीटर स्कवायर जबकि उत्तर होता है बीस स्कवायर मीटर।

आज ‘गणित’ ओल्म्पियाड की दौड़ में शामिल हो चुका है परन्तु एक ऐसा विषय बनकर जो मशीन की तरह काम करने वाले लोगों के काम तो आता है परन्तु आनंद की गुंजायिश बहुत कम हो गई है। कोई बी.एड. डिग्री देने वाला काॅलेज इस बारे में नहीं सोचता या ऐसे कारकों पर ध्यान नहीं देना चाहता। केवल पैसा बनाने के उद्देश्य वाले बहुत सारे साधारण किस्म के काॅलेज आज दुकानें खोलकर बैठ गए है। 

यदि कोइ्र भूले भटके इस तरह का प्रयास करने के लिए आगे भी आये तो आजकल की सरकारों की उदासीनता ही उन्हें निष्क्रिय कर देती है। अन्यथा ये टीचर निर्माता पफैक्टरीज अपने अध्यापकों को विदेशों के अच्छे विश्वविद्यालयों में उनके तंत्रा और विकास को सीखने के लिए भेज सकती है। मैं कुछ विशिष्ट नामों का उल्लेख अवश्य कर सकता हं। जैसे कोवेन्टरी का कोवेनटरी काॅलेज आॅपफ एजुकेशन और कैम्ब्रिज का हाॅमर्टन काॅलेज आदि। मैं उनके नाम अनुशंसित कर सकता हूँ।